


Daughter right in father estate कुछ ही दिन पहले हमारे देशकी सुप्रीम कोर्टने प्रॉपर्टी के फॅमिली डिस्प्यूटमे एक अहम निर्णय किया हे, यह १२१ पन्नेका निर्णय विनीता शर्मा विरुद्ध राकेश शर्मा के केसमे लिया गया हे।
विनीता शर्मा विरुद्ध राकेश शर्मा का केस पिताकी संपत्ति के लिए हिन्दू सक्सेशन कानून की कलम-५ और ६ के सन्दर्भमे किया गया था, जिसमे सुप्रीम कोर्टने तारीख ०९-०९-२००८ से कलम-५ और ६ के रेफरेन्स में हुए शंशोधनको १९५६से एप्लीकेबल करके बेटीयो को विरासत की प्रोपेर्टीमे बेटे जितना ही अधिकार प्रदान किया हे और निर्णय के पेराग्राफ नंबर ५०मे भावनात्मक तरीके से कहा की " बेटियां हमेशा बेटियाँ ही रहती हे जबकि लड़को, की पत्नी आती हे तब तक ही बेटेकी तरह रहते हे, जबकि बेटिया जीवनभर साथ निभाती हे।
सुप्रीम कोर्टने पहले तारीख १६/१०/२०१५ का प्रकाश विरुद्ध फूलवती के केसमें किया निर्णय निषेध कर दिया हे जिसमे डिवीज़न बेन्चने ०९-०९-२००५के संशोधन को ये तारीख के बाद का गिना था और बाप-बेटी जीवित हे तो ही यह शंशोधन का लाभ ले सकती हे इसप्रकार का निर्णय किया था।

हिन्दू फेमिली के लिए सदीयोसे विरासतवाली प्रॉपर्टी का अलग कानून हे, ये कानून में समयानुसार परिवर्तन भी किये गए हे विरासतवाली प्रॉपर्टीमें हिस्सेके मामलेमे महिलाओको कोई जगह नहीं थी ये विसंगतताको दूर करके महिलाको पुरुषके अधिकार के बराबर रखने के लिए कानूनमें शंशोधन किये गए और लागु किये गए।
सन २००५ में किये गए शंशोधन का महत्वपूर्ण प्रावधान यही कहता था की ये शंशोधन के पहले पिता, पुत्र और पत्नी को ही विरासतवाली प्रॉपर्टीमें हक्क दिया गया था पुरुष का जन्म होते ही विरासतवाली प्रॉपर्टीमें हिस्सा मिल जाता था ।
अगर उनके पिताजी जीवित नहीं होते तो उनको यह अधिकार नहीं मिल पाता था ऐसी परिस्थितिमे बेटियोंको कोई अधिकार नहीं दिया जा सकता इस प्रकारके कई निर्णय लोअर कोर्ट के सुप्रीम कोर्ट के सामने आये, सुप्रीम कोर्टने पहले किये निर्णयमे यह प्रस्थापित किया था की ०९-०९-२००५ के दिन या फिर उससे पहले पिता और बेटी जीवित होती हे तभी जीवित बेटियों को ही पिता की संपत्ति में हिस्सा मिल सकता हे

ऐसे विपरीत निर्णय करने का कारण ऐसा भी हो सकता हे की अगर बेटियोंको पिता की विरासतवाली प्रोपेर्टीमे बेटे जितना बराबर का हक दे दिया जाय तो पिता शंशोधन की तारीख ०-०९-२००५के दिन जीवित हे या नहीं वो तय करनेकी जरुरत नहीं ।
क्योकि बेटी को तो जन्म सही विरासतवाली प्रॉपर्टीमें हक मिलजाता हे ये शंशोधन किया गया इसके पीछे की मंशा ये थी की पुराने व्यवहारों के बारेमे बेट्यो या फिर उनके वारिस कोर्टमे राइट क्लेम करने नहीं आये, फॅमिलीमे झगड़े-कलेश नहीं हो इसीलिए पिताकी हाजरी को हरूरी माना गया ये मांशभि सही थी लेकिन कानून से शायद अनुरूप नहीं थी।

इसी कारण सुप्रीम कोर्टने विनीता शर्मा विरुद्ध राकेश शर्मा के केसमे ये निर्णय किया की ०९-०९-२००५ से पहले जन्म लेनेवाली बेटियोंको वो जिन्दा होती हे ।
लेकिन उनके पिताजी ०९-०९-२००५ को जिन्दा नहीं होते तो बेटियां विरासतवाली प्रॉपर्टीमें अपना बराबर का हिस्सा मांग नहीं सकती थी लेकिन, अब ऐसा नहीं होगा ०९-०९-२००५ से पहले जन्म लेनेवाली बेटियोंको वो जिन्दा होती हे ।
लेकिन उनके पिताजी ०९-०९-२००५ को जिन्दा नहीं होते तो भी बेटियां पिता की विरासतवाली प्रॉपर्टीमें अपना बराबर का हिस्सा मांग सकती हे, इसप्रकार बेटियोका बड़ा समूह जो पिताकी विरासतवाली प्रोपेर्टीमे बराबर का हिस्सा नहीं माँगा था वो सभी बेटियां अपने पिताकी विरासतवाली प्रोपेर्टीमे सुप्रीम कोर्ट के यह निर्णय के आधार पर अधिकार मांग सकती हे और क्लेम कर सकती हे

विरासतवाली प्रॉपर्टी की नेटवर्क चैन टूटती हे और पिता स्व उपार्जित धनसे कोई प्रॉपर्टी खरीद करता हे तो उसके ऊपर बेटियों को कोई हक नहीं मिलता ।
लेकिन अगर पिता बिना विल याने वसीयतनामा किये गुजर जाता हे तो प्रथम श्रेणी में निर्दिष्ट किये वारिसों को प्रोपेर्टीमे बराबर का हक मिलता हे, प्रथम श्रेणीमे निर्दिष्ट सन्तानोमे बेटिया होती हे तो अब से बेटियोंको भी पिताकी सम्पत्तिमे बराबर का हिस्सेदार बनाया गया हे।
इसप्रकार बेटियोंको अपने बुज़ुर्गोंकी विरासतवाली प्रॉपर्टी में हिस्सा, और पिताकी स्व उपार्जित और पतिकी स्व उपार्जित प्रोपेर्टीमे हिस्सा मिलेगा।

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